Breaking News:

बिहार, खबरों से आगे।

बिहार:बेगूसराय में 200 साल पुरानी अनोखी परंपरा, हर शाम फूलों से सजती हैं मां भगवती, सुबह विसर्जन – Unique 200-year-old Tradition In Begusarai Every Evening Goddess Bhagwati Is Adorned With Flowers


देशभर में नवरात्र के दौरान मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। कहीं मिट्टी की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, तो कहीं आकर्षक पंडालों में मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना होती है। लेकिन बिहार के बेगूसराय जिले के विक्रमपुर गांव में नवरात्र की परंपरा सबसे अलग है। यहां मां भगवती की मिट्टी की स्थायी प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती। इसके बजाय हर शाम ताजे फूलों, बेलपत्र और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से मां का नया स्वरूप तैयार किया जाता है। रातभर जागरण, कीर्तन और मंत्रोच्चार के बीच आराधना होती है और अगली सुबह उस स्वरूप का विसर्जन कर दिया जाता है।

ग्रामीणों के अनुसार, करीब 200 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। इस पूजा की खासियत केवल इसकी अनूठी विधि ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी ऐतिहासिक मान्यता भी है। ग्रामीणों का विश्वास है कि मां जयमंगला के प्रति सामूहिक आस्था ने उनके पूर्वजों को आपसी हिंसा और संघर्ष से बाहर निकलकर शांति और सद्भाव की राह अपनाने की प्रेरणा दी।

हर शाम मां का नया स्वरूप, सुबह होता है विसर्जन

विक्रमपुर गांव में नवरात्र शुरू होते ही भक्ति का विशेष माहौल बन जाता है। प्रतिदिन शाम को श्रद्धालु और पुजारी मिलकर ताजे फूलों, हरी पत्तियों, बेलपत्र और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से मां भगवती का स्वरूप तैयार करते हैं। इस दौरान पारंपरिक पूजा-विधियों का पालन किया जाता है।

रात में जागरण, कीर्तन और मंत्रोच्चार के बीच मां की आराधना होती है। श्रद्धालु पूरी रात भक्ति में लीन रहते हैं। सुबह होते ही तैयार किए गए स्वरूप का विसर्जन कर दिया जाता है। इसके बाद अगली शाम फिर से मां का नया स्वरूप तैयार किया जाता है।

इस तरह नवरात्र के दौरान हर दिन मां का स्वरूप बदलता है। प्रतिदिन सृजन और विसर्जन की यह परंपरा धार्मिक आस्था, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और निरंतर साधना का अनूठा संगम है। जहां अधिकांश स्थानों पर मां दुर्गा की प्रतिमाएं कई दिनों तक स्थापित रहती हैं, वहीं विक्रमपुर में हर शाम नया स्वरूप तैयार करना और अगली सुबह उसका विसर्जन करना इस पूजा को अलग पहचान देता है।



पढ़ें: किन विभागों के अफसरों-कर्मियों पर निगरानी की नजर? घूसखोरों के पकड़ाने का खतरा कहां, देखें ट्रेंड



जमंगलागढ़ से जुड़ी है परंपरा की ऐतिहासिक कहानी


गांव के निवासी संगीत भारती के अनुसार, इस परंपरा का इतिहास कई पीढ़ियों पुराना है। ग्रामीणों की मान्यता है कि उनके पूर्वज पूजा-अर्चना के लिए प्रसिद्ध सिद्धपीठ जमंगलागढ़ जाया करते थे। इसे उनके वंश का प्रमुख धार्मिक और पवित्र स्थल माना जाता था।

ग्रामीणों के मुताबिक, उस दौर में आसपास के गांवों के लोगों के बीच अक्सर विवाद, मारपीट और लड़ाई-झगड़े होते थे। विक्रमपुर गांव भौगोलिक रूप से अंतिम छोर पर स्थित था। ऐसे में जमंगलागढ़ से लौटने के दौरान ग्रामीणों और उनके पूर्वजों को हमलों और मारपीट का सामना करना पड़ता था।

स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, एक बार बलि देने की परंपरा को लेकर भी बड़ा विवाद हुआ था। मामला इतना बढ़ गया कि पंचायत बुलानी पड़ी। काफी प्रयासों के बाद विवाद शांत कराया गया, लेकिन आपसी तनाव बना रहा।

इन परिस्थितियों से परेशान होकर पूर्वजों ने मां जयमंगला के सामने अपनी व्यथा रखी। ग्रामीणों का विश्वास है कि इसके बाद मां की आराधना के प्रति उनकी आस्था और मजबूत हुई तथा गांव में पूजा की ऐसी परंपरा विकसित हुई, जो आज भी जारी है। हालांकि, इस ऐतिहासिक कहानी के विवरण की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। यह जानकारी ग्रामीणों की मान्यताओं और स्थानीय जनश्रुतियों पर आधारित है।



हिंसा से सद्भाव तक का संदेश


विक्रमपुर की इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक सद्भाव से भी जुड़ा है। ग्रामीणों के अनुसार, अतीत में आसपास के गांवों के बीच विवाद और मारपीट की घटनाएं चिंता का विषय थीं। धार्मिक आयोजनों के दौरान उपजे विवादों ने लोगों को शांति और एकता के महत्व का एहसास कराया। मां जयमंगला के प्रति सामूहिक आस्था ने ग्रामीणों को एक मंच पर आने का अवसर दिया। पूजा-अर्चना के माध्यम से लोगों ने आपसी मतभेदों को पीछे छोड़कर एक साथ धार्मिक परंपरा निभाने की राह अपनाई।

हालांकि, पूजा शुरू होने के बाद सभी विवाद पूरी तरह समाप्त हो गए, इसकी पुष्टि करने वाले प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। फिर भी ग्रामीण इस परंपरा को शांति, विश्वास और सामूहिक एकजुटता से जोड़कर देखते हैं। आज यह आयोजन नई पीढ़ी को गांव की सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी है।



मिट्टी की प्रतिमा नहीं, प्राकृतिक सामग्री से होती है आराधना


विक्रमपुर की पूजा की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यहां मां भगवती का स्वरूप तैयार करने में ताजे फूलों, बेलपत्र और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है। प्रतिदिन नई सजावट और नया स्वरूप तैयार होने से पूजा में निरंतर नवीनता बनी रहती है।

पूजा के लिए सामग्री जुटाने से लेकर मां का स्वरूप तैयार करने तक श्रद्धालु अपनी भागीदारी निभाते हैं। इससे यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामूहिक सहयोग और पारंपरिक ज्ञान का प्रतीक भी बन जाता है। हर शाम तैयार होने वाले स्वरूप का अगली सुबह विसर्जन कर दिया जाता है। श्रद्धालुओं के लिए सृजन और विसर्जन की यह प्रक्रिया आस्था की निरंतरता का प्रतीक है।



दो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम है परंपरा


ग्रामीणों के अनुसार, करीब 200 वर्षों से चली आ रही इस पूजा ने समय के साथ अपनी अलग पहचान बनाई है। आधुनिक दौर में जहां धार्मिक आयोजनों में भव्य सजावट, विशाल पंडाल और स्थायी प्रतिमाओं का चलन है, वहीं विक्रमपुर के लोग अपनी पुरानी परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए हैं।

इस परंपरा को जारी रखने में बुजुर्गों के अनुभव, पुजारियों की भूमिका और ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है। नई पीढ़ी भी इस आयोजन के माध्यम से गांव के इतिहास, लोकविश्वास और सांस्कृतिक विरासत से परिचित होती है। ग्रामीणों के लिए यह परंपरा केवल नवरात्र तक सीमित नहीं है। यह उनके पूर्वजों की स्मृतियों, धार्मिक विश्वास और गांव की विशिष्ट पहचान से जुड़ी हुई है।

बेगूसराय की लोकसंस्कृति का अनूठा अध्याय

विक्रमपुर गांव की नवरात्र पूजा बेगूसराय की विशिष्ट लोकपरंपराओं में शामिल है। हर शाम फूलों और बेलपत्र से मां का नया स्वरूप तैयार करना, रातभर आराधना करना और सुबह विसर्जन करना इसे दूसरी जगहों की पूजा-पद्धतियों से अलग बनाता है।

इस आयोजन की खासियत इसकी प्राचीनता के साथ-साथ इससे जुड़ा सामाजिक संदेश भी है। ग्रामीणों की मान्यता है कि मां जयमंगला की आराधना ने उन्हें आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुट रहने की प्रेरणा दी। इस परंपरा के इतिहास, पूजा-विधि और स्थानीय जनश्रुतियों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाए, तो बिहार की विशिष्ट लोकसंस्कृति और धार्मिक विरासत के इस अनूठे पहलू को व्यापक पहचान मिल सकती है।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *