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बिहार:पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला-सेवानिवृत्त अधिकारी की पेंशन में कटौती रद्द, अब ब्याज समेत लौटानी होगी रकम – Bihar: Patna High Court’s Major Ruling Pension Cut Of Retired Officer Quashed.


Bihar: Patna High Court's major ruling  Pension cut of retired officer quashed.

पटना हाईकोर्ट
– फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पटना उच्च न्यायालय ने एक सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी की पेंशन में 75 प्रतिशत की स्थायी कटौती वाले राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने यह स्पष्ट सिद्धांत प्रतिपादित किया कि सेवानिवृत्ति के बाद चार साल से अधिक पुराने किसी भी मामले में विभागीय कार्रवाई आरंभ नहीं की जा सकती।


न्यायमूर्ति कुमार मनीष की एकलपीठ ने सेवानिवृत्त अधिकारी उमेश कुमार वर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की रोकी गई पूरी पेंशन तथा अन्य सेवानिवृत्ति संबंधी सभी बकायों का भुगतान आठ सप्ताह के भीतर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ सुनिश्चित करे।

चार साल की समय-सीमा का उल्लंघन

यह मामला अररिया जिला में वर्ष 2006 से 2009 की अवधि के दौरान सांसद एवं विधायक क्षेत्र विकास योजनाओं के तहत हाईमास्ट लाइट लगाने में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित है। याचिकाकर्ता 31 दिसंबर, 2014 को सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे, जबकि उन्हें दंडात्मक आरोपों से जुड़ा आरोपपत्र 10 जनवरी, 2015 को मिला था। उच्च न्यायालय ने मामले के मूल सरकारी अभिलेखों की गहन जांच की। जांच के बाद अदालत ने पाया कि आरोपपत्र सेवानिवृत्ति की तिथि से पहले अधिकारी को तामील नहीं कराया गया था। बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के प्रावधानों के तहत किसी भी विभागीय कार्रवाई की शुरुआत आरोपपत्र की वास्तविक तामील की तारीख से मानी जाती है। इस आधार पर नियमावली में निर्धारित चार साल की कानूनी समय-सीमा का स्पष्ट उल्लंघन हुआ था।

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प्राकृतिक न्याय का हुआ हनन

विभागीय जांच प्रक्रिया में गंभीर कमियों को उजागर करते हुए उच्च न्यायालय ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन पर सवाल उठाए। जांच अधिकारी ने जिलाधिकारी की एक ऐसी रिपोर्ट को अपना आधार बनाया, जिसकी प्रति याचिकाकर्ता अधिकारी को प्रदान नहीं की गई थी। इस कारण अधिकारी को अपना पक्ष रखने या सफाई देने का अवसर नहीं मिल सका। इसके अतिरिक्त अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सक्षम प्राधिकारी की औपचारिक मंजूरी के बिना ही विभागीय जांच के दौरान आरोपों की संख्या चार से बढ़ाकर छह कर दी गई थी।

अधिकारियों पर तय होगी जवाबदेही

अदालत ने विभागीय जांच प्रक्रिया और उसके आधार पर पारित दंडादेश को निरस्त करते हुए इस मामले को पुनः जांच के लिए भेजने से साफ इन्कार कर दिया। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिया कि वह प्रशासनिक स्तर पर हुई देरी और प्रक्रियागत अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करे। अदालत ने कहा कि सरकार ऐसे दोषी अधिकारियों पर जवाबदेही तय करे, जिससे भविष्य में नियमों की अनदेखी को रोका जा सके।



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